उपहार

लेखक - संतोष कुमार साहू (प्रकृति)

एक गरीब संतराम अपने घर की एक कोने में बैठ कर बिलख -बिलख कर रो रहा था. अट्ठारह साल की अनिता उसकी अकेली संतान थी. उनकी पत्नि मधु भी अपनी पुत्री की चिंता में कमजोर हो गई थी. डाक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार अनिता का हृदय खराब हो चुका था. अनिता बस चार दिनो की मेहमान थी. डाक्टरों ने सलाह दी कि यदि कोई अपना हृदय अनिता को दे दे, तो उसकी जान बचायी जा सकती है. शर्त ये थी कि अनिता का खून जिससे मिलता है उसी का हृदय काम आयेगा. अनिता का खून का ग्रुप ‘ओ निगेटिव’ था, जो बहुत कम मिलता है. केवल एक ही व्यक्ति का खून मिलता था और वह था स्वअयं संतराम. डाक्टरों ने उससे कहा यदि तुम अपना हृदय देते हो तो तुम्हारी बेटी की जान बच जायेगी.

यह बात सोचकर संताराम परेशान था. उसी समय उसकी लाडली बेटी अनिता आयी और बोली पिता जी २९ फरवरी को मेरी जन्म दिन है. मुझे उपहार में क्या देंगे. अचानक संतराम का ह्रदय हि‍ल उठा. हां उपहार! वह अवाक रह गया. अनिता की बात संतराम के कानों में गूंजती रही. सहम कर उसने अपनी बेटी को कहा – ‘‘हां बेटी मै तुम्हें ऐसा उपहार दूंगा जिसको दुनिया के किसी पिता ने अपनी बेटी को नहीं दिया होगा.’’ अनिता खुश होकर चली गई.

२९ फरवरी वह दिन जो चार साल में एक बार आता है. संयोग से अनिता का जन्म दिन उसी दिन था और डाक्टरों ने भी ह्रदय का आपरेशन उसी दिन के लिए तय किया था. नियत तिथि को डाक्टरों ने अनिता का आपरेशन किया. आपरेशन सफल रहा. आपरेशन के बाद अनिता ने आंखें खोली तो उसके सामने डाक्टर एवं उनका पूरा स्टाफ खड़ा था. डाक्टर ने उसे एक पत्र दिया. अनिता पत्र पढ़कर फूट- फूट कर रोने लगी. पत्र में लिखा था – ‘‘बेटी जब तुम यह पत्र पढ़ रही होगी तो मैं तुम्हारे पास नहीं होऊंगा. तुमने मुझसे जन्मदिन का उपहार मांगा था. मैंने कहा था कि दुनिया का सबसे बडा उपहार दूंगा. बेटी मैंने अपना ह्रदय तुम्हेग दे दिया है. मेरा ह्रदय तुम्हारे अंदर धड़क रहा है. मेरे पास तुम्हेंत देने को बस अपना दिल ही था. जिसे मैने तुम्हें दे दिया बेटी. अपनी मां की ख्याल रखना. तुम्हारा भाग्यवान पिता – संतराम.’’ पत्र पढ़कर अनिता अपने ह्रदय को स्पर्श कर चीख पड़ी – ‘‘पिता जी......’’

सोने का अंडा

लेखक - महेंद्र सिंह साहू, कक्षा-4, प्राथमिक शाला बर्रापारा डौंडीलोहारा

एक गांव में किसान रहता था. उसका नाम रामु था. रामु के पास कुछ मुर्गियां थीं. उनमे से एक मुर्गी कुछ अलग ही दिखती थी. उसका रंग सुनहरा होने के कारण रामु ने उसका नाम सुनहरी रख दिया था. सुनहरी बाकी मुर्गियों की अपेक्षा थोड़ी बड़ी और गोलमटोल थी.

रामु उन्हें दाना पानी देता और आंगन में खुला छोड़ देता और अपने काम पर लग जाता. उसके पास अधिक खेत नही था जिसके कारण फसल भी नही हो पाती थी. वह कभी -कभी अंडों या कभी मुर्गियों को बेच कर रसोई समान लाता था. एक बार मुर्गियों ने अंडे दिए तो एक अंडा सुनहरा था. रामु ने उस अंडे को ध्यान से देखा वह सोने का ही था. वह बहुत खुश हुआ. उसको समझते देर नही लगा कि यह सुनहरी ने ही दिया है. उसने अंडा संभाल कर रख दिया. अगले दिन फिर अंडों में एक सोने का निकला. अब रामु सब सोने के अंडों को जमा करने लगा. जरूरत पड़ने पर वह उनको बेच कर उनके लिए दाना और रसोई समान खरीद लाता.

रामु कुछ दिन तो सामान्य रहा. फिर उसके मन मे लालच ने जगह बना ली. उसने सोचा सुनहरी रोज एक अंडा देती है अगर उसके सारे अंडे एक बार मे निकाल लूं तो क्या बुराई है. ऐसा सोचकर उसने सुनहरी को मार दिया. पर यह क्या न सोने के अंडे मिले न सुनहरी रही. वह दौडकर घर के अंदर आया तो देखा सारे सोने के अंडे माटी बन चुके थे. रामु सिर पकड़ कर रोने लगा. उसे अपने किये पर पछतावा हुआ. काश की उसने लालच न किया होता तो वह सुनहरी के अंडों से अपनी गरीबी दूर कर सकता था, पर अब क्या हो सकता था. ज्यादा लालच सदा ही बुरा होता है.

सीख - लालच बुरी बला है ज्यादा लालच से बनता काम भी बिगड़ जाता है.

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